मेरी बदलती ज़िन्दगी
कहते है ज़िन्दगी बहुत छोटी है और इस ज़िन्दगी के हर एक छोटे-मोटे पल पल को समझदारी व ख़ुशी से जीना चाहिए.यह बात तो बहुत सुनी थी मगर समझा तब जब अपनी ज़िन्दगी के हर पल को हाथों से तेजी फिसलते हुए देखा.tab समझा की ज़िन्दगी बहुत अनमोल है जो शायद ही दुबारा मिले.मैं यानी अनामिका को अगर आपने तीन साल पहले देखा होता तो आज आपके जो विचार है वो ना होते.चलिए मैं आपको आज से तीन साल पहले की अनामिका से मिलवाती हूँ.अनामिका जिसका उस समय मतलब था शर्म,हिचकिचत,बोलने में कंजूसी,हसने में कंजूसी.उस समय मेरी चाल-ढाल अलग थी.सब्र की कोई सीमा नहीं थी.कोई कुछ भी कहे बस उसको सुन लेना मेरी आदत में था.कभी गुस्सा भी ठीक से करना नहीं आता था.बोलना सबसे था लेकिन ज्यादा नहीं शायद इसकी वजह मेरा ज्यादा लोगो पर भरोसा ना कर पाना था.हमेशा से अपनी बातों को अपने तक रखती थी.शायद उस वक़्त इन सब वजहों से मैं जमाने से पीछे छूट जा रही थी.कभी फैशन करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.पहले कभी बालों को इस्टैलिश नहीं कटवाया क्यूंकि तब कुछ लडकियां थी जिनके स्कूल में फैशन करने पर या बाल कटवाने पर वो प्रिंसिपल मैम की नज़रों में गलत लडकियां बन जाती थी.इन चीज़ो को देखकर कभी हिम्मत नहीं हुई ये सब करने की.मुझे अपनी छवि से बहुत प्यार था.जिसे मैं किसी हालत में खराब नहीं करना चाहती थी.लेकिन कहते है ना ज़िन्दगी में कुछ पल ऐसे भी आते है जो आपको बदल कर रख देते है और आप को देख कर,महसूस कर के सोचते है की क्या मैं भी कभी ऐसी हो सकती हूँ.मेरी ज़िन्दगी को बदलने वाले पलों ने मेरी ज़िन्दगी में तब दस्तक दी जब मैं 11th क्लास में पहुंची.जिस सोच ने मेरे अंदर बदलाव लाया वो थे की अब बस स्कूल के 2 साल बचे है और मौज मस्ती का 1 साल क्यूंकि 1 साल यानी की 12th क्लास तो टीचर्स की डाट और लेक्चर्स में निकल जाना है.मेरा 11th क्लास का अवतार देख कर सबकी आँखे बड़ी हो जाती थी और मुँह खुला रह जाता था और फिर चालु होती थी कंट्रोवर्सीज लड़कियों के बीच में खुसफुसाहट.अरे अनामिका को देखा कितनी बदल गयी है.कुछ ज्यादा ही बोलने लगी है,दूसरे ने कहा लगता है इसका बॉयफ्रेंड भी है,तीसरे ने कहा हाँ-हाँ मैंने भी सुना है.मैंने एक लड़के से बात क्या कर ली वो मेरा बॉयफ्रेंड बन गया.तब पता चला जो लडकियां सामने अच्छी बनती थी वो अंदर से कितनी खोटी थी.बुरा लगता था ये सब देख कर लेकिन अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था की कौन क्या सोचता है या कहता है.मुझे बस खुश रहना था.डर का फोबिया दिमाग से निकल गया था.खुश तो इतना रहने लगी थी की जब फिल्म मबीकेडी यानी मेरे ब्रदर की दुल्हन देखि तो क्लास के आखरी पीरियड में शराब पीने की एक्टिंग और फिर सीट पे खड़े होके कटरीना कैफ की एक्टिंग कर डाली.हालाँकि वो मुझे पसंद नहीं है लेकिन ख़ुशी का नशा ही कुछ ऐसा चढ़ा था की कुछ समझ नही आया.वाट तो तब लगी जब प्रिंसिपल मैम ने मुझे ये सब करते हुए देख लिया लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा और चुप चाप चली गयी.तब महसूस हुआ की वो शायद वो इतनी बुरी भी नहीं है.धीरे-धीरे समय बीता और कॉलेज में आई.मेरी बची कूची हिचकिचाहट और घबराहट भी गुलाब गैंग में एंटर करते ही गायब हो गयी.अब जो अनामिका है वो आपके सामने है.मैं पहले क्या थी और क्या आज हूँ.ऐसा नहीं की मैंने शर्म और डर को एकदम से त्याग दिया है.ये तभी महसूस होती है जब मैंने कुछ गलत किया हो.लेकिन अब बोलने में,महसूस करने में,समझने में और गुस्सा करने में कोई पाबन्दी नहीं लगाती हु.आज मुझे लगता है की मैं जमाने के साथ चलती हूँ.घर में सब मुझे देख कर यही कहते है की मैं पहले ''भोलूराम'' थी लेकिन अब ''बोलूराम'' बन गयी हूँ.अब तो बस इस छोटी सी ज़िन्दगी को जीने का नशा सवार है और ज़िन्दगी में कुछ अच्छा कर गुजरने का नशा सवार है.क्यूंकि कहते है ना की दुनिया चमकते हीरे को देखना पसंद करती है ना की जलते कोयले को.इसलिए मैं उस चमकते हीरे की तरह लोगो की नज़रों में हमेशा के लिए चमकना चाहती हूँ..
कहते है ज़िन्दगी बहुत छोटी है और इस ज़िन्दगी के हर एक छोटे-मोटे पल पल को समझदारी व ख़ुशी से जीना चाहिए.यह बात तो बहुत सुनी थी मगर समझा तब जब अपनी ज़िन्दगी के हर पल को हाथों से तेजी फिसलते हुए देखा.tab समझा की ज़िन्दगी बहुत अनमोल है जो शायद ही दुबारा मिले.मैं यानी अनामिका को अगर आपने तीन साल पहले देखा होता तो आज आपके जो विचार है वो ना होते.चलिए मैं आपको आज से तीन साल पहले की अनामिका से मिलवाती हूँ.अनामिका जिसका उस समय मतलब था शर्म,हिचकिचत,बोलने में कंजूसी,हसने में कंजूसी.उस समय मेरी चाल-ढाल अलग थी.सब्र की कोई सीमा नहीं थी.कोई कुछ भी कहे बस उसको सुन लेना मेरी आदत में था.कभी गुस्सा भी ठीक से करना नहीं आता था.बोलना सबसे था लेकिन ज्यादा नहीं शायद इसकी वजह मेरा ज्यादा लोगो पर भरोसा ना कर पाना था.हमेशा से अपनी बातों को अपने तक रखती थी.शायद उस वक़्त इन सब वजहों से मैं जमाने से पीछे छूट जा रही थी.कभी फैशन करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.पहले कभी बालों को इस्टैलिश नहीं कटवाया क्यूंकि तब कुछ लडकियां थी जिनके स्कूल में फैशन करने पर या बाल कटवाने पर वो प्रिंसिपल मैम की नज़रों में गलत लडकियां बन जाती थी.इन चीज़ो को देखकर कभी हिम्मत नहीं हुई ये सब करने की.मुझे अपनी छवि से बहुत प्यार था.जिसे मैं किसी हालत में खराब नहीं करना चाहती थी.लेकिन कहते है ना ज़िन्दगी में कुछ पल ऐसे भी आते है जो आपको बदल कर रख देते है और आप को देख कर,महसूस कर के सोचते है की क्या मैं भी कभी ऐसी हो सकती हूँ.मेरी ज़िन्दगी को बदलने वाले पलों ने मेरी ज़िन्दगी में तब दस्तक दी जब मैं 11th क्लास में पहुंची.जिस सोच ने मेरे अंदर बदलाव लाया वो थे की अब बस स्कूल के 2 साल बचे है और मौज मस्ती का 1 साल क्यूंकि 1 साल यानी की 12th क्लास तो टीचर्स की डाट और लेक्चर्स में निकल जाना है.मेरा 11th क्लास का अवतार देख कर सबकी आँखे बड़ी हो जाती थी और मुँह खुला रह जाता था और फिर चालु होती थी कंट्रोवर्सीज लड़कियों के बीच में खुसफुसाहट.अरे अनामिका को देखा कितनी बदल गयी है.कुछ ज्यादा ही बोलने लगी है,दूसरे ने कहा लगता है इसका बॉयफ्रेंड भी है,तीसरे ने कहा हाँ-हाँ मैंने भी सुना है.मैंने एक लड़के से बात क्या कर ली वो मेरा बॉयफ्रेंड बन गया.तब पता चला जो लडकियां सामने अच्छी बनती थी वो अंदर से कितनी खोटी थी.बुरा लगता था ये सब देख कर लेकिन अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था की कौन क्या सोचता है या कहता है.मुझे बस खुश रहना था.डर का फोबिया दिमाग से निकल गया था.खुश तो इतना रहने लगी थी की जब फिल्म मबीकेडी यानी मेरे ब्रदर की दुल्हन देखि तो क्लास के आखरी पीरियड में शराब पीने की एक्टिंग और फिर सीट पे खड़े होके कटरीना कैफ की एक्टिंग कर डाली.हालाँकि वो मुझे पसंद नहीं है लेकिन ख़ुशी का नशा ही कुछ ऐसा चढ़ा था की कुछ समझ नही आया.वाट तो तब लगी जब प्रिंसिपल मैम ने मुझे ये सब करते हुए देख लिया लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा और चुप चाप चली गयी.तब महसूस हुआ की वो शायद वो इतनी बुरी भी नहीं है.धीरे-धीरे समय बीता और कॉलेज में आई.मेरी बची कूची हिचकिचाहट और घबराहट भी गुलाब गैंग में एंटर करते ही गायब हो गयी.अब जो अनामिका है वो आपके सामने है.मैं पहले क्या थी और क्या आज हूँ.ऐसा नहीं की मैंने शर्म और डर को एकदम से त्याग दिया है.ये तभी महसूस होती है जब मैंने कुछ गलत किया हो.लेकिन अब बोलने में,महसूस करने में,समझने में और गुस्सा करने में कोई पाबन्दी नहीं लगाती हु.आज मुझे लगता है की मैं जमाने के साथ चलती हूँ.घर में सब मुझे देख कर यही कहते है की मैं पहले ''भोलूराम'' थी लेकिन अब ''बोलूराम'' बन गयी हूँ.अब तो बस इस छोटी सी ज़िन्दगी को जीने का नशा सवार है और ज़िन्दगी में कुछ अच्छा कर गुजरने का नशा सवार है.क्यूंकि कहते है ना की दुनिया चमकते हीरे को देखना पसंद करती है ना की जलते कोयले को.इसलिए मैं उस चमकते हीरे की तरह लोगो की नज़रों में हमेशा के लिए चमकना चाहती हूँ..
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