हर जनरेशन का अलग वैलेंटाइन सेलिब्रेशन
वैलेंटाइन डे प्यार का दिन और प्यार करने वालों का दिन.इस दिन को हर कोई मनाता है फिर चाहे वो बूढ़े हो या फिर जवान.जहाँ आज कल के युवा कपल अपने पार्टनर को टेडी,रोज,चॉकलेट देकर अपने प्यार का इज़हार करते है तो वही आजकल के बुद्धे अपने पार्टनर को टेडी,रोज,चॉकलेट देने के साथ साथ अपने फीमेल पार्टनर के बालों में गजरा लगाकर उन्हें हग भी कर लेते है.प्यार तो आजकल सभी करते है.फिर चाहे वो vi क्लास का बच्चा हो या फिर नर्सरी का.अच्छी लड़की देखते ही मन डोलने लग जाता है.दिल के बैकग्राउंड में रोमांटिक सोंग्स बजने लग जाते है जैसे की तुम ही हो,मेरे हाँथ में तेरा हो...कुछ को तो स्कूल की लड़कियों में कोई इंटरेस्ट नहीं होता.वो तो कॉलेज की लड़कियों के सपने देखते है लेकिन सपनो पे पानी तो तब फिर जाता है जब बॉयज कॉलेज में एडमिशन्स लेना पड़ता है.बचारे सपने कांच ली तरह टुकड़ों में टूट कर बिखर जाते है.सोचा क्या था और हुआ क्या.इससे अच्छा तो यही है की स्कूल की लड़की को पता लिया होता.वैसे आजकल की लडकियां भी कम नहीं है.फिर चाहे वो लड़की नर्सरी की हो या vi क्लास की हो या फिर कॉलेज की.हैण्डसम,सिक्सपैकस और स्पाइकस बालों वाले लडको को देखते ही मन डोलने लग जाता है.मुसीबत तो तब होती है जब गर्ल्स कॉलेज में एडमिशिन हो जाता है और कॉलेज भी ऐसा जहाँ पर स्कूल हो.वैसे हम अपने कॉलेज मजीसिपिएस का एक्साम्प्ले ले सकते है.यहाँ लादिक्यान हमेशा परेशान रहती है.अरे नहीं-नहीं पढाई,नोट्स,टीचर्स,फैसिलिटीस इन सब से परेशान नहीं रहती है बल्कि लड़कों के ना होने की वजह से परेशान रहती है.बस गनीमत इस बात की है की क्लास 12 के लड़के दिख जाते है तो थोड़ी परेशानी कम हो जाती है.फिर भले ही लंच 25 मिनट का हो तो क्या हुआ अगर लड़का उनके सामने से जा रहा हो तो या उनसे कुछ दूरी पर खड़ा हो तो वो आराम से 25 मिनट में से 20 मिनट उसको देखने में बीता सकती है.अरे कोई नहीं लंच नहीं किया तो क्या हुआ कम सेकम कॉलेज के 5 घंटो में से 20 मिनट तक उस लड़के को देख तो लिया.बेचारी कुछ लडकियां वैलेंटाइन डे पर बस देखती रह जाती है.वैसे वैलेंटाइन वीक आने पर मार्किट भी जोरो शोरो से प्यार के रंग में रगने लग जाता है.जो रोज पहले 10-15 रुपये में मिल जाता था वही वैलेंटाइन वीक स्टार्ट होने पर 50-100 में बिकने लग जाता है.एक बार ग्रेजुएशन लेवल के कपल्स तो फिर भी एडजस्ट कर लेते है लेकिन बेचारे स्कूल के जूनियर और नर्सरी वालों की तो बात ही रहने दो.उनके पास तो पॉकेट मनी ही नहीं होती.बस मीठी मीठी बातें कर के ही लड़कियों को पटाये रखते है लेकिन बेचारे स्कूल के जूनियर बच्चो का क्या होता होगा जिनकी पॉकेट मनी 50-100 तक फिक्स रहती है.बेचारों को समझ ही नहीं आता की वो क्या ले.सारी चीज़े अच्छी क्वालिटी और ब्रांडेड चाहिए होती है.जैसी की डेरी मिल्क सिल्क चॉकलेट वो 50 रुपये से ऊपर वाली,अच्छा सा खिला हुआ बड़ा रोज,एक अच्छा सा और बड़ा टेडी जिसमे आई लव यू लिखा हो,और साथ ही एक बड़ा सा वैलेंटाइन डे कार्ड जिसके अन्दर उनकी खूब सारी तारीफे और जानू,जान,डिअर,शोना,डार्लिंग जैसे शब्दों का भर पूर डोस दिया हो.तब जाकर उनका मूड अच्छा नहीं बल्कि ठीक ठाक होता है.अरे भाई वो सारी चीज़े बॉयफ्रेंड के मुँह से सुने बिना कहाँ से चैन मिलेगा.कुछ तो आज के दिन सफल हो जाते है लेकिन कुछ लोगो के गालों पे चार उँगलियों और एक अंगूठे का निशाँ कायदे से छप जाता है.छपे भी क्यूँ न बहुत ओवर कॉन्फिडेंस से वाइट या येलो लेने के बजाये रेड रोज लेके पहुच जाते है उन्हें प्रोपोसे करने के लिए और इम्प्रेस करने के लिए गाना भी तैयार करके जाते है जैसे की तूने मारी एंट्रियाँ रे,और जब गाल पे थप्पड़ पड़ता है तो तुरंत ही सारे तारें आसमान से गिर कर आँखों के सामने नज़र आने लगते है और तब उनका चेहरा ख़ुशी से लाल की जगह थप्पड़ से बेरंग हो जाता है.तब उन्हें समझ आता है की वैलेंटाइन डे बोर्ड एग्जाम से भी ज्यादा कठिन है.लेकिन बोर्ड एग्जाम में तो किसी तरह सेतो पास हो जातें है लेकिन वैलेंटाइन का पपेर आसानी से पास नहीं हो पाटा है.इसलिए कहते है की एग्जाम देने से पहले पूरी तैयारी अच्छे से कर लेनी चाहिए वरना फ़ैल होने के चांसेस ज्यादा हो जाते है..