Monday, 18 August 2014

                                               कल की अनारकली,आज की विरोधकाली

कहते है प्यार एक ऐसी चीज़ है जिसे ना तो कोई समझा पाया है और ना ही कोई समझ पाया है.जिससे पूछा उसने यही कह के समझाया की जब हम दूसरों के लिए कुछ अलग महसूस करे,जब हम किसी के बारें में सोचते रहे,उसके बारे में बातें करे,उसके साथ  रहना चाहे इन हालदों को देख कर यह घोषित कर दिया जाता है की उन्हें प्यार हो गया है लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें इस उलझन में फसें रह जातें है और एक गाना जो इन सारी उलझनों पर एकदम फिट बैठता है वो है''अजीब दास्ताँ है यह,कहाँ शुरू कहाँ  खत्म,यह मंजिलें है कौन सी,ना वो समझ सके ना हम''.वैसे बहुत सटीक लिखा गया है इस गाने को.कभी-कभी तो लोगो को पहली ही नज़र में प्यार हो जाता है और यह कोई अफवाह नहीं बल्कि सच है क्यूंकि ऐसा हमारे इतिहास में भी हुआ है.ऐसे बहुत से जोड़े है जो आज भी हमारे सामने प्यार का प्रतीक बन कर खड़े है जैसे की शाहजहाँ-मुमताज,सलीम-अनारकली,हीर-रांझा,जोधा-अकबर इत्यादि.लेकिन पहली नज़र वाले प्यार का शिकार जो हुए थे वो थे सलीम.सलीम को अनारकली से पहली नज़र में ही प्यार हो  गया था और उनकी नज़रें तब अनारकली के प्यार में पड़ गयी थी जब अनारकली ने पहली बार उनके सामने मुजरा किया था.सलीम को तो मानो उनकी दुनिया ही मिल गयी हो.आये थे वो 14 साल बाद अपने पिता की राजगद्दी को संभालने लेकिन राजगद्दी संभालने से पहले ही वो किसी और को अपने दिल में संभालने लग गए.धीरे-धीरे अनारकली भी सलीम के प्यार में पड़ गयी और तभी से शुरू हो गया छुप-छुप कर मिलने का सिलसिला और इस परिस्तिथि में जो गाना फिट बैठता है वो है''छुप-छुप के,छुप-छुप के चोरी से चोरी,छुप-छुप के,छुप-छुप के रे''.अब समय आ गया था जब सलीम ने अपने पिता को अपने रिश्ते के बारे में बताया लेकिन मानो उनकी तक़दीर में उन दोनों का मिलना नहीं लिखा था.जब पिता अकबर को उनके रिश्ते के बारें में पता चला तो उन्होंने इस रिश्ते को यह कह कर इंकार कर दिया की अनारकली उनके जैसे शहजादों के परिवार की नहीं है.वो एक नौकरानी और नाचने वाली है जिसकी वजह से वो दोनों एक नहीं हो सकते.बहुत मनाने के बाद भी जब अकबर नहीं माने तो सलीम ने अपने प्यार को पाने के लिए उनसे युद्ध किया लेकिन उसमे भी वो हार गए और फिर अकबर ने उनके सामने दो विकल्प रखे की या तो वो अनारकली को उन्हें सौप दे या फिर वो अपनी जान दे दे.जिसमे सलीम ने अपनी जान देना चुना लेकिन अनारकली ने अपने प्यार को बचाने के खातिर अकबर के सामने अपनी ज़िन्दगी उनको सौपने का एलान करती है लेकिन अपनी एक इक्छा वो उनके सामने रखती है की वो सलीम के साथ एक रात बिताना चाहती है और एक रात के बाद सलीम अनारकली एक दूसरे के ना हो सके.दूसरे दिन अकबर ने अनारकली को दिवार में चुनवा कर दोनों को जुदा कर दिया.आखिर किस हद्द तक अकबर का यह फैसला सही था और साथ ही साथ अनारकली और सलीम का भी.जहाँ अकबर ने उन्हें एक नहीं होने दिया तो वही अनारकली और सलीम ने भी इस फैसले को सही साबित किया.अनारकली ने अपनी जान देने का फैसला किया लेकिन अगर वो सलीम से प्यार करती थी तो उन्होंने साथ ज़िन्दगी बिताने का फैसला क्यों नहीं लिया.एक रिश्ते को अधूरा छोड़ कर उन्होंने मरने का फैसला किया.शायद अगर में उनकी जगह होती तो  ऐसा ना करती क्यूंकि मैंने और सलीम ने तो अकबर को मानना चाहा था लेकिन वो नहीं माने थे और दुनिया में कहीं ऐसा नहीं लिखा है की दो प्यार करने वालों को उनके माँ-बाप की इजाजत मिलने पर ज़िन्दगी साथ बिताने का हक़ मिले.मैं तो सलीम के साथ भाग कर अपना एक अलग आशियाँ बनाती जिसमे प्यार करने वालों को पूरा हक़ होता की वो जिस से प्यार करना चाहे कर सकते है और पूरी ज़िन्दगी साथ में बिता सकते है क्यूंकि कहते है ना प्यार वो बला है जो करे वो भी पछताए जो ना करे वो भी पछताए तो इसलिए मैं प्यार कर के पछताना पसंद करुँगी और अगर शायद उस समय की अनारकली ने भी प्यार कर के  पछताने का फैसला लिया होता तो शायद आज उनका प्यार इतिहास के पन्नो में कमजोरी का नहीं बल्कि मजबूती का प्रतीक होता.कहते है की''आधा इश्क़ धीरे-धीरे पूरा हो जाता है लेकिन इनका इश्क़ आधा था,आधा है और हमेशा की लिए इतिहास के पन्नो में आधा बन कर रह गया है''... 

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